Friday, July 27, 2012

हस्बे मामूल ....

कुछ दिनों पहले संस्कृत  शिक्षकों के प्रशिक्षण के दौरान लगा की वाकई देश गहरी मानसिक गुलामी में है , 
शिक्षा को ताक पे रखकर किस तरह का विकास हो रहा है न जाने ?  विद्यालयों में न भवन , न  पुस्तकालय  , न मैदान , न मन न उत्साह ...बस एक खानापूर्ति ...विद्यालय न हुआ एक वृहद्द सरकारी फाइल फोल्डर हो गया .....जिसमें हर साल नए नामों के आवेदन याने कुछ जिन्दे जिन्दे से बच्चे घुस जाते हैं और कुछ अरसे बाद बाहर किसी कचरे के डब्बे में फेंक दिए जाते हैं ............विकास से याद आया ..... एक असमी लड़की जो बमुश्किल  अठारह उन्नीस की होगी मोडर्न  होने की चाहत में अथवा अपने सहज किशोर सुलभ कुतूहल में बार में जाकर शराब पीती है , फिर बाहर कुछ मनचले मोडर्न मर्द  या न जाने क्या होने के सुरूर में उसके कपडे फाड़ते हैं .....
स्त्री  का सम्मान करना तो भारतीय संस्कृति सिखाती है किन्तु ये नहीं बताती शायद के,  कपडे , उसमें लिपटा देह , और देह में बसने वाला व्यक्तित्व  इनमें से " स्त्री " संज्ञा  देह और व्यक्तित्व की है ...कपडे तो बस कपडे हैं ...........

भारत और पाकिस्तान रुपी दो चेतनाएं इसी उलझन में हैं के किस तरह व्यवस्था लगाएं , कैसे विकास करें ?
पाकिस्तान को लगता है के स्त्री की परिभाषा में तीन तत्व एक साथ जोड़ दिए जाएँ , अन्यथा ऐसी समस्याएँ आती रहेंगी ...जो खास पोषक में हो , वो देह , और उसमें बसने वाला स्त्री का व्यक्तित्व  ये तीन एक साथ स्त्री संज्ञक हैं ...ऐसी उनकी धारणा जान पड़ती है ...

पर ये सोच भी मुट्ठी में भिंची रेत की तरह लगती है ........यदि खास पोषक और देह  में अपेक्षित "व्यक्तित्व " न पाया जाये तो क्या करें ?  जैसे   बेनजीर भुट्टो ? या फिर इंदिरा गांधी ? इनको पोशाकें कैसे बांध सकेंगी ?

इसपर ये खास सोच दावा करती है " व्यक्तित्व " गढ़ने का ...पर  उस पूरी परंपरा में  यकसाँ व्यक्तित्व रखने वालियाँ चौदह सौ साल में कभी नहीं पैदा हुईं ...हो भी कैसे ? कैसे भला कोई मनुष्य की असीम चेष्टाओं और अगम्य  पारिस्थितिक ताने बाने से उपजते "व्यक्तित्व " को किसी फेक्ट्री से निकलती कोला की बोतलों सा यकसाँ उत्पादित करे ? ...

मैं नहीं जानता हम "भारतीय " किस तरह की सोच को लेकर आगे बढ़ रहे हैं ? हाँ इतना पता है के ये वो नहीं जो स्त्री को वस्त्र विशेष देह विशेष और व्यक्तित्व विशेष का  अन्योन्याश्रित समास मानती हो ....................................................



Saturday, December 11, 2010

!! नमस्ते परब्रह्मणे !!

सभी पाठकों को मेरा सादर नमस्कार !!

बहुत समय से सुन रखा था के कुछ " ब्लॉग " वगैरह भी होता है , कभी प्रयत्न न किया इस दिशा में , तकनीक और उसके नित नवीन प्रयोगों के विषय मे मैं कुछ प्रमादी ही हूँ , आज सहसा ये ब्लॉग का द्वार भी अनजाने में  खुल गया , करने गया था gtalk डाउनलोड और ये भी दिख गया मुझे ब्लॉग का कोना , सो इसे भी शुरू कर लिया !!

अनेक विषय हैं अनेक बातें हैं , अब सिलसिला चल पडा है सो लगता है आगे भी बढेगा | मैं आर्य समाज से  और संस्कृत से जुड़ा हूँ अतः इन विषयों पर पहले चर्चा करूँगा और ऑरकुट की पृष्ठभूमि से उठने वाले प्रश्नों की छाया इन आगामी  चर्चाओं में वरीयता पायेगी | इस नवीन क्षेत्र में पदार्पण करते हुए मैंने " अथ " शब्द का प्रयोग किया है जो आर्ष रीति में ग्रन्थारम्भ करने का एक शुभद सार्थक शब्द है , मुझे शुरुवात इसी शब्द से करना उचित जान पडा | शेष लेखन टिप्पणियाँ आने के बाद !! शुभं तावत्